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Tuesday, 25 August 2020

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 दोस्तों इस भाग में Soil के बारे में विस्तार से जानेंगे 




Soil को Genesis यानी उत्पत्ति , Color , Composition यानी रचना और Location आदि के आधार को लेकर इन्हे 8 वर्गों में बांटा गया है


 


और ये 8 Types हैं- 





  1.  Alluvial Soil यानी जलोढ़ मृदाएं  

  2. Black Soil यानी काली मृदाएं

  3. Red and Yellow Soil यानी लाल और पीली मृदाएं

  4. Laterite Soil 

  5. Arid Soil यानी शुष्क मृदएं 

  6. Saline Soil यानी लवण मृदाएं

  7. Peaty Soil यानी पीटमय मृदाए

  8. Forest Soil यानी वन मृदाएं





इसमें सबसे पहले Alluvial soils यानी जलोढ़ मृदाएं की बात करते हैं 


 



Alluvial Soil Grey Color की होती है और यह soil नदियों और धाराओं से बहकर आकर जमा होती है 


यह Soil सबसे ज्यादा पंजाब , हरियाणा , उत्तर प्रदेश , बिहार और कुछ बंगाल के हिस्सों में पाई जाती हैं


 


यह राजस्थान के Narrow हिस्सों में और गुजरात के हिस्सों में पाई जाती है


Alluvial Soil में Potash बहुत होती है जबकि Phosphorus की मात्रा बहुत कम होती है 


Note 

Potash को समझे तो यह एक प्रकार का Salt ore  होता है और Potash ore का Use Glass या Shop बनाने में अधिक होता है 




वहीं Phosphorus एक बहुत Reactive Element है जो Fertilisers में Use होता है 

  

Phosphorus सबसे अधिक मरने वाले Animals और उनके मल मूत्र के Deposits में सबसे ज्यादा होता है




अगर Alluvial soil का Deposits New हो और ये सालाना floods यानी बाढ़ के कारण जमा होता है तो इसे Khadar कहते हैं 


 



जबकि वह Soil जो सालाना floods से Deposits नहीं होती और वो काफी समय से धीरे-धीरे करके Deposits होती है उसे बांगर ( Bhangar) कहते हैं 








Black soil ( काली मृदाएं )



Black Soil गीली होने पर फूल जाती है और चिपचिपी हो जाती है और सूखने पर यह सिकुड़ जाती है और गर्मी के मौसम में इनमें चौड़ी - चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं |


 


 इसकी विशेषता होती है कि लंबे समय तक इस Soil में नमी बनी रहती है इसलिए वह फसलें जो वर्षा पर निर्भर रहती हैं उन्हें गर्मी के दिनों में भी इनसे Moisture यानी नमी प्राप्त होती रहती है |


यह Soil Deccan plateau के राज्य जिनमें महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश , गुजरात , आंध्र प्रदेश और कुछ हिस्सा तमिलनाडु का भी वहां पर यह Soil पाई जाती है |




इस Black Soil में Lime , Iron , Magnesia और Alumina अधिक पाया जाता है 

इसमें Potash भी पाया जाता है लेकिन Phosphorus , Nitrogen और Organic की मात्रा कम होती है 


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अब बात करते हैं Red and Yellow Soil यानी लाल और पीली मृदाएं | 



 Red Soil Deccan plateau के East और South  क्षेत्र में जहां कम वर्षा होती है और जहां अधिक crystalline Igneous Rocks होते हैं जिन्हे हिंदी में आग्नेय चट्टान कहते हैं वहां पर यह Soil पाई जाती हैं |




Note: 


दोस्तों Igneous Rocks के बारे में थोड़ा जान लेते हैं वैसे Rocks या चट्टाने तीन प्रकार की होती हैं -



  1.  Sedimentary Rocks यानी अवसादी चट्टानें यह धरती की ऊपरी सतह के मिट्टी , रेत , mineral , पानी और हवा आदि के इकट्ठा और जमने के कारण बनती है 


जैसे - कि  सीमेंट , रेत और पानी को मिलाकर जमाया जाता है | 



वही एक दूसरे प्रकार की Rocks होती है जिसे 


   Igneous Rocks या Magnetic Rocks भी कहते हैं |  इसे हिंदी में अग्निमय चट्टान कहा जाता है यह Igneous Rocks  , magma यानी ज्वालामुखी के ठन्डे होने से बनती है | 


और तीसरे Type की Rocks होती है जिसे 


 Metamorphic Rocks भी कहते हैं इसे हिंदी में रूपांतरित चट्टानें भी कहते हैं | 


यह Rocks existing Rocks में Temperature और Pressure की वजह से इसकी Form बदलती है और यह बनती है |


SLATE और Marble , Metamorphic Rocks की श्रेणी में आते हैं







 


जैसा कि हमने बताया था कि Red Soil वहां पाई जाती है जहां Igneous Rocks यानी अग्निमय चट्टाने पाई जाती हैं और जहां कम वर्षा होती है |


Red soil पश्चिम में तमिलनाडु , कर्नाटक , 

 दक्षिण में महाराष्ट्र , छत्तीसगढ़ , तेलंगाना , आंध्र प्रदेश , उड़ीसा , झारखंड के छोटा नागपुर plateau में पाई जाती हैं |




इनके अलावा कुछ अन्य जगहों पर जैसे - उत्तर प्रदेश के इलाकों में बांदा , हमीरपुर और West Bengal कुछ स्थानों पर पाई जाती हैं और North East के कई प्रदेशों में भी ये Soil पाई जाती हैं |


इसी Red Soil में अगर पानी हो तो यह Yellow Color यानी पीली भी दिखती है | 



इस Soil को ( पानी को रोक कर रखने की क्षमता ) कम होती है और इनमें Nitrogen , Phosphorus और Humus यानी उपजाऊ हेतु (Organic Matter ) आदि कमी होती है  |


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अब बात करते हैं लेटराइट सॉइल 




लेटराइट सॉइल ,   चट्टानों के टूट-फूट से बनती है लेटराइट सॉइल में आयरन ( iron ) और एलुमिनियम ( Aluminium )  की अधिक मात्रा होती है |


 मकान बनवाने के लिए लेटराइट सॉइल का प्रयोग ईट बनाने में किया जाता है

और लेटराइट सॉइल को ईट के आकार में भी काटा जाता है |इस soil में  ह्यूमस ( humus)  यानी उपजाऊ हेतु ( organic matter)  ऑर्गेनिक पदार्थ की कमी होती है जबकि आयरन ऑक्साइड  ( iron oxide ) और पोटास ( potash ) अधिक होता है | 




 लेटराइट सॉइल भारत में कर्नाटक , केरला , तमिलनाडु ,  मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा और आसाम के पहाड़ी इलाकों में पाई जाती है |




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अब बात करते हैं Arid soil ,  इसे हिंदी में शुष्क मृदाए कहा जाता है |  




यह soil  , sand ( रेत )  की तरह होती है और यह नमकीन भी होती है |


कई जगह पर इस soil में नमक की मात्रा इतनी हो जाती है की पानी में घोलकर , फिर पानी को evaporate करने के बाद  , इससे नमक प्राप्त किया जा सकता है |


जैसा कि यह soil रेतीली होती है , इसी कारण इसके तल में कंकर कि (layer) परत बन जाती है  , जिससे पानी का infiltration यानी पानी का रिसाव सीमित हो जाता है |

इसलिए सिंचाई के पौधों को अधिक नमी मिलती है 




यह soil  पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती है | 




जहां यह पाई जाती है वहां temperature अधिक होने से ,  इसमे नमी और humus की कमी रहती है |


इस soil  में nitrogen  की कमी होती है  , पर phosphate  पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है |



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अब बात करते हैं saline soil  की ,  इसे हिंदी में लवण मृदाए कहते हैं |





यह soil  को कुशल के नाम से भी जाना जाता है ,  इस soil  में सोडियम (sodium) , पोटेशियम (potasium),  मैग्नीशियम (magnesium)  की मात्रा अधिक होती है | 


और इसलिए यह soil उपजाऊ हेतु अनिवार्य नहीं होती है | 

इस soil  में नमक अधिक होने के दो कारण होते हैं जिनमें पहला कारण है dry climate यानी शुष्क जलवायु ,  और दूसरा कारण है poor drainage यानी खराब अपवाह या कहे पानी का जमा होना | 



इस तरह के soilarid या semi-arid soil  ,  जहां पानी की  भीषण कमी होती है  , या फिर  जीव जंतु का पालन पोषण करने के लिए  पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं होता है ,  उन जगहों पर यह Soil पाई जाती पाई जाती है | 




यह soil ,   waterlodged areas जहां पानी इकट्ठा होता रहता है वहां या फिर swampy areas यानी दलदल इलाकों में भी है soil पाई जाती है |





यह soil पश्चिमी गुजरात के ( Runn of kutch ) रण आफ कच्छ में , ( Eastern ghats deltas ) ईस्टर्न घाट के  डेल्टास में तथा पश्चिम बंगाल ( West Bengal )  के सुंदरबन के इलाकों में पाई जाती है | 



 खेती के उन क्षेत्रों में जहां पानी की कमी होती है वहां अधिक पानी देने के कारण soil  के ऊपर नमक की मात्रा अधिक जमा होने लगती है इन जगहों पर खासकर पंजाब और हरियाणा में किसानों को जिप्सम ( Gypsum )  use  करने की सलाह दी जाती है जिससे नमक जमने की  समस्या हल  हो जाती है |




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अब बात करते हैं Peaty Soil पीटमय मृदाएं 




यह soil  उन areas  में पाई जाती है ,  जिनमे भारी वर्षा होती है और humidity ( नमी )  बहुत अधिक होती है | 



इस soil  में उपजाऊ ( Organic matter ) ऑर्गेनिक मैटर की मात्रा अधिक होती है  , यह दिखने में ब्लैक कलर ( black color) की होती है | 



बिहार के उत्तरी भाग ( easter bihar ) में   , उत्तरांचल के दक्षिणी भाग ( Southern Uttranchal )  में  में पाई जाती है  , इसके अलावा पश्चिम बंगाल  , उड़ीसा और तमिलनाडु के ( Coastal Areas )  , कॉस्टल एरिया (Coastal Areas )  में पाई जाती हैं | 


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अब बात करते हैं कि Forest Soil ( वन  मृदाएं ) की |






Forest Soil  जैसा कि नाम है जंगलों में पाई जाती है  , जहां पर्याप्त बरसा नहीं होती है | 



ऐसे जंगल हिमालय में पाए जाते हैं और यह राज्य हैं जम्मू कश्मीर ( Jammu & Kashmir ) , उत्तराखंड ( Uttrakhand ) , सिक्किम (Sikkim)  ,हिमाचल प्रदेश ( Himachal Pradesh )   और अरुणाचल प्रदेश  ( Arunachal Pradesh)




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